जी चाहता है

पसन्द तो तेरा चेहरा भी नही है

पसंद तो तेरा चेहरा भी नही है

फिर भी तुम्हे ताऊम्र देखने को चाहता है

पसन्द तो उनकी कद भी नही है

पसन्द तो उनकी कद भी नही है

फिर भी उन्हे गले लगाने को जी चाहता है

युं हमे भी पसन्द नही वक़्त बर्बाद करना

युं हमे भी पसन्द नही वक़्त बर्बाद करना

बस तेरे लिये खुद को तबाह कर लेने को जी चाहता है

वो लाख़ सताले हमको वो लाख़ भुला दे हमको

वो लाख़ सताले हमको वो लाख़ भुला दे हमको

जाने क्यू तुझे खुद मे ढ़ूठ लेने को जी चाहता है

वैसे तो अमीर बनने का सौख नही हमे

वैसे तो अमीर बनने का सौख नही हमे

बस तेरी खुद्दारी खरीद लेने को जी चाहता है

वैसे तो जिस्म की जरुरत नही है हमे

वैसे तो जिस्म की ज़रूरत नही हमे

बस तेरी रूह से लिपट जाने को जी चाहता है

तेरी इस ज़रा से गुस्ताखी को

तेरी इस ज़रा से गुस्ताखी को

उम्र कैद देने को जी चाहता है

कल तक तो इबादत करता था

कल तक तो इबादत करता था

आज इबादत मे फनाह हो जाने को जी चहता है

कल तक तो प्यार से जलता था

कल तक तो प्यार से जलता था

आज प्यार मे जल जाने को जी चाहता है

कल तक तो डूबने से डरता था

कल तक तो डूबने से डरता था

आज तेरी इस छोटी सी सागर मे अपनी कस्ती डुबा देने को जी चाहता है

(स्वरचित कविता)    :  अभिषेक राजभर

17UEC082    

   Sec – F

%d bloggers like this: